विदेशी लुटेरे कुतुबद्दीन ऐबक और विष्णु स्तम्भ (कुतुबमीनार) का असली सच
विदेशी लुटेरे कुतुबुद्दीन ऐबक, और विष्णु स्तंभ (क़ुतुबमीनार) का सच जो हम लोगों से छुपाया गया
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अगर किसी भी देश पर शासन करना है तो उस देश के लोगों का ऐसा ब्रेनवाश कर दो कि वो अपने देश, के प्राचीन गौरवशाली संस्कार, संस्कृति, विरासत, धर्म, शिक्षा और इतिहास को भूलकर अपने पूर्वजों के बारे में जानना और उन पर गर्व करना छोड़ दें । विदेशी आक्रांता, लुटेरे, अत्याचारी, विधर्मी मुगल इस्लामी हमलावरों और उनके बाद अंग्रेजों ने भी भारत में यही सब किया।
कुछ विदेशी लुटेरी ताकतों के एक बहुत बडे षड्यंत्र के कारण हम अपने देश के गौरवशाली संस्कार, संस्कृति, विरासत धर्म, शिक्षा और इतिहास को भूलकर अपने महान पूर्वजों पर गर्व करना भूल गये और उन विदेशी लुटेरे, हरामी, आततायी, विधर्मी, राक्षसी अत्याचारियों को ही एक षडयंत्र के कारण महान समझने लगे जिन्होंने भारत पर बेहिसाब जुल्म,बर्बरता और अत्याचार किये थे ।
भारतवर्ष के लाखों लाखों कमजोर हिन्दुओं को मार मारकर तलवार की नोक पर विधर्मी राक्षस मुगलों ने मुस्लिम धर्म कबूल करवाकर मुस्लमान बना दिया था । ये सच है कि कमजोर, गरीब, मजबूर और डरपोक हिन्दू लोग डरकर अपना धर्म छोड़कर विद्यर्म अपना लेते हैं । इतिहास गवाह है कई सदियों से अब तक भारत में यही होता रहा है ।
अगर आप भारत की राजधानी दिल्ली घुमने गए हैं तो आपने कभी विष्णू स्तम्भ रहे (क़ुतुबमीनार) को भी अवश्य देखा होगा। कुछ चाटुकार वामपंथी इतिहासकारों ने जिसके बारे में लिखा है कि उसे विदेशी आक्रांता, लुटेरे बर्बर अत्याचारी, कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनबाया था। हम कभी इतिहास का सच जानने की कोशिश ही नहीं करते हैं कि लुटेरा, अत्याचारी, ये हरामी कुतुबुद्दीन ऐबक था कौन ?, उसने कितने बर्ष दिल्ली पर शासन किया ? उसने कब विष्णू स्तम्भ (क़ुतुबमीनार) को बनवाया या विष्णू स्तम्भ (कुतूबमीनार) से पहले वो और क्या क्या बनवा चुका था ? हिन्दुस्तान में कुछ बिके हुए, तलवेचाट, चाटुकार इतिहासकारों ने गलत इतिहास लिख दिया या लिखवाया गया इसके लिए
पूर्ववर्ती सरकारें भी उतनी ही दोषी हैं । ऐसे लोगों को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा । एक न एक दिन सच सामने आकर ही रहेगा ।
दो खरीदे हुए गुलाम
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लुटेरा,कुतुबुद्दीन ऐबक, विदेशी , लुटेरे आक्रांता, अत्याचारी, हरामी, बेरहम, व्यभिचारी, विधर्मी मोहम्मद गौरी का खरीदा हुआ गुलाम था। लुटेरा मोहम्मद गौरी भारत पर कई हमले कर चुका था मगर हर बार उसे हारकर अपनी जान बचाकर वापस भागना पडा था । सतरा बार तो वह पृथ्वीराज जी चौहान से ही हारकर, जान की भीख मांगकर भागा था । वह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की जासूसी और कुतुबुद्दीन ऐबक की बेरहम, अत्याचारी रणनीति के कारण लुटेरा मोहम्मद गौरी, तराइन की लड़ाई महान पृथ्वीराज चौहान को जयचंदों के कारण धोखे और विश्वासघात करके हराने में कामयाबी रहा और अजमेर / दिल्ली पर उसका कब्जा हो गया ।
ढाई दिन का झोंपड़ा
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जयचंदों के धोखे और विश्वासघात के कारण अजमेर पर कब्जा होने के बाद विदेशी लुटेरे, आक्रांता मोहम्मद गौरी ने जासूस ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती से इनाम मांगने को कहा । तब जासूस ख्वाजा मोइनुदीन चिश्ती ने अपनी जासूसी का इनाम मांगते हुए, एक भव्य मंदिर की तरफ इशारा करके मोहम्मद गौरी से कहा कि तीन दिन में इस मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना कर दो । तब मोहम्मद गौरी के लुटेरे अत्याचारी गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने कहा कि आप तीन दिन की बात कह रहे हैं मैं यह काम आपको ढाई दिन में कर के दूंगा ।
कुतुबुद्दीन ऐबक ने ढाई दिन में उस मंदिर को तोड़कर मस्जिद में बदल दिया । अजमेर में आज भी यह जगह "अढाई दिन का झौंपड़ा" के नाम से जानी जाती है। जीत के बाद लुटेरे हरामी मोहम्मद गौरी, ने पश्चिमी भारत की जिम्मेदारी "कुतुबुद्दीन ऐबक " को और पूर्वी भारत की जिम्मेदारी अपने दुसरे सेनापति "बख्तियार खिलजी" (जिसने नालंदा को जलाया था) को सौंप कर वापस चला गय था ।
दोनों गुलामों को शासन
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कुतुबुद्दीन कुल चार साल ( 1206 से 1210 तक) दिल्ली का शासक रहा. इन चार साल में वो अपने राज्य का विस्तार, इस्लाम के प्रचार और बुतपरस्ती का खात्मा करने में लगा रहा. हांसी, कन्नौज, बदायूं, मेरठ, अलीगढ़, कालिंजर, महोबा, आदि को उसने जीता. अजमेर के विद्रोह को दबाने के साथ राजस्थान के भी कई इलाकों में उसने काफी आतंक मचाया ।
विष्णु स्तम्भ
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जिसे क़ुतुबमीनार कहते हैं वो महाराजा वीर विक्रमादित्य की वेदशाला थी. जहा बैठकर खगोलशास्त्री वराहमिहर ने ग्रहों, नक्षत्रों, तारों का अध्ययन कर, भारतीय कैलेण्डर "विक्रम संवत" का आविष्कार किया था. यहाँ पर 27 छोटे छोटे भवन (मंदिर) थे जो 27 नक्षत्रों के प्रतीक थे और मध्य में विष्णू स्तम्भ था, जिसको ध्रुव स्तम्भ भी कहा जाता था ।
दिल्ली पर कब्जा करने के बाद उसने उन 27 मंदिरों को तोड दिया. विशाल विष्णु स्तम्भ को तोड़ने का तरीका समझ न आने पर उसने उसको तोड़ने के बजाय अपना नाम दे दिया. तब से उसे क़ुतुबमीनार कहा जाने लगा. कालान्तर में कुछ चाटुकार वामपंथी इतिहासकारों ने यह झूठ प्रचारित किया गया कि क़ुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनबाया था. जबकि वो एक विध्वंशक था न कि कोई निर्माता.
कुतुबुद्दीन ऐबक की मौत का सच
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अब बात करते हैं कुतुबुद्दीन की मौत की. इतिहास की किताबो में लिखा है कि उसकी मौत पोलो खेलते समय घोड़े से गिरने पर से हुई. ये अफगान / तुर्क लोग "पोलो" नहीं खेलते थे, पोलो खेल अंग्रेजों ने शुरू किया. अफगान / तुर्क लोग बुजकशी खेलते हैं जिसमे एक बकरे को मारकर उसे लेकर घोड़े पर भागते है, जो उसे लेकर मंजिल तक पहुंचता है, वो जीतता है ।
कुतबुद्दीन ने अजमेर के विद्रोह को कुचलने के बाद राजस्थान के अनेकों इलाकों में कहर बरपाया था. उसका सबसे कडा विरोध उदयपुर के राजा ने किया, परन्तु कुतुबद्दीन उसको हराने में कामयाब रहा. उसने धोखे से राजकुंवर कर्णसिंह को बंदी बनाकर और उनको जान से मारने की धमकी देकर, राजकुंवर और उनके घोड़े शुभ्रक को पकड कर लाहौर ले गया ।.
एक दिन राजकुंवर ने कैद से भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़ा गया. इस पर क्रोधित होकर अत्याचारी हरामी, दोगली,कुतुबुद्दीन ने उसका सर काटने का हुकुम दे दिया। दरिंदगी दिखाने के लिए उसने कहा कि बुजकशी खेला जाएगा लेकिन इसमें बकरे की जगह राजकुंवर का कटा हुआ सर इस्तेमाल होगा । हरामी और दोगले कुतुबुद्दीन ने इस काम के लिए, अपने लिए घोड़ा भी राजकुंवर का "शुभ्रक" चुना ।
हरामी कुतुबुद्दीन ऐबक "शुभ्रक" घोडे पर सवार होकर अपनी टोली के साथ जन्नत बाग में पहुंचा । राजकुंवर को भी जंजीरों में बांधकर वहां लाया गया. राजकुंवर का सर काटने के लिए जैसे ही उनकी जंजीरों को खोला गया, शुभ्रक घोडे ने उछलकर कुतुबुद्दीन को अपनी पीठ से नीचे गिरा दिया और अपने पैरों से उसकी छाती पर कई बार किये, जिससे दोगला, हरामी और अत्याचारी विधर्मी कुतुबुद्दीन ऐबक वहीं पर मर गया ।
शुभ्रक मरकर भी अमर हो गया
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इससे पहले कि सिपाही कुछ समझ पाते शुभ्रक घोड़ा दौड़कर अपने प्रिय स्वामी के पास पहुंच गया । राजकुंवर लपक कर अपने शुभ्रक घोडे पर सवार होकर वहां से भाग निकले । कुतुबुदीन के सैंकड़ों घुड़ सवार और सैनिकों ने उनका पीछा किया मगर वो उनको पकड न सके। हवा के वेग दौड़ता हुआ शुभ्रक घोड़ा, कई दिन और कई रात दौड़ता रहा और अपने स्वामी को लेकर उदयपुर के महल के सामने आ कर रुका । वहां पहुंचकर जब राजकुंवर ने उतर कर उसे पुचकारा तो वो मूर्ति की तरह शांत खडा रहा ।
शुभ्रक घोड़ा मर चुका था, सर पर हाथ फेरते ही उसका निष्प्राण शरीर लुढ़क गया । विदेशी, लुटेरे, अत्याचारी कुतुबुद्दीन ऐबक की मौत और शुभ्रक की स्वामिभक्ति की इस घटना के बारे में हमारे स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता है लेकिन इस घटना के बारे में फारसी के प्राचीन लेखकों ने काफी लिखा है. धन्य है भारत की भूमि जहाँ इंसान तो क्या जानवर भी अपनी स्वामी भक्ति के लिए प्राण दांव पर लगा देते हैं ।
जय हिन्द । जय भारत ॥ वन्दे मातरम ॥
प्रस्तुति - निर्माता निर्देशक -चिरँजी कुमावत, 8619666046,
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