इतिहास से - दगाबाज, विश्वासघाती, दोगला और हरामी मुगल अमीर अली

लेख -

इतिहास के झरोखे से....एक सच्ची घटना पर आधारित.....        क्या आपने कभी, "जिस थाली में खाये उसी थाली में छेद करने वाले, हरामी, दोगले, धोखेबाज, स्वार्थी और दगाबाज मुगलों की औलाद अमीर अली का नाम सुना है?

शूरवीरों की इस महान धरती राजस्थान के इतिहास में यह उस दगाबाज कमीना व्यक्ति का नाम है जिसके धोखे और दगाबाजी के कारण राजस्थान की वीरांगनायें  जौहर नहीं कर पाई और उन्हें तलवारों से काटना पड़ा था । अब तक दुनियाँ के इतिहास में ऐसे कमीने और हरामी आंक्रांता मुगलों की औलादों के अलावा और कोई नहीं हुआ है ।

तो चलिए आज मैं आपको राजस्थान प्रदेश के जैसलमेर के राजा श्री लूणकरण जी के साथ हुए धोखे, दगाबाजी  और विश्वासघात की सच्ची कहानी बताता हूँ ।, जो धोखेबाज  मुगलों की दोगली औलाद की छद्म मित्रता के नाम पर राजस्थान के सबसे बड़े धोखे और दगाबाजी के शिकार हो गये थे ।

हरामी मुगल अमीर अली कंधार का नवाब था, तथा उसकी उसके भाई के साथ सत्ता को लेकर लड़ाई हो गयी और उसके भाई ने उसे हरा कर मार पीटकर कंधार से भगा दिया , अपने सगे भाई से हारने के बाद हरामी और धोखेबाज अमिर अली अपनी जान बचाकर कंधार से भागा और जैसलमेर के दयालु राजा श्री लूणकरण जी के चरणों में पड़कर  शरण देने की भीख मांगने लगा ।
भारतीय सनातन हिन्दू धर्म की ये खूबी कहें या कमजोरी,
की अपने शरणागत की रक्षा करना भारतीय संस्कृति का  एक अभिन्न अंग माना जाता है ।
इतिहास गवाह है,
अपने सगे बाप और भाई को मारकर सता हासिल करने वाले दोगले मुगलों की ऐसी फितरत जानते हुए भी राजस्थान प्रदेश के जोधपुर के दयालु महाराजा श्री लूणकरण जी ने दगेबाज दोगले अमीर अली को इंसानियत के नाते शरण दे दी और इस दगेबाज दोगले मुगल पर भरोसा करके उसे अपना मित्र भी मान लिया ।
  दोनों ने अपनी मित्रता को दर्शाने के लिए  एक दूसरे की पगड़ियाँ तक बदल ली  । राजा लूणकरण जी ने यह जानते हुए भी कि जो दोगले मुगल अपने बाप और अपने भाई के सगे नहीं होते वो मेरा  क्या होगा। ऐसा जानते हुए भी इस दगाबाज भगोड़े अमीर अली  पर भरोसा और विश्वास करके उसे  जैसलमेर में जागीर देकर उसके रहने का स्थायी प्रबंध  कर दिया ।
इतिहास गवाह है
भारतीय सनातन हिन्दू धर्म की ऐसी दरियादिली, जहाँ जहाँ भी, जब जब भी दोगले मुगलों पर भरोसा और विश्वास किया है मुगलों ने  हमेशा बदले में विश्वासघात, धोखा और दोगलापन ही किया है । क्योंकि कोई माने या नहीं मानें
पर सच्चाई यही है कि दोगलापन, धोखेबाजी, लुटपाट, दुराचार, अत्याचार, व्यभिचार और विश्वासघात मुगलों का जन्म जात गुण और धर्म है ।
उधर जोधपुर में समय का कालचक्र चलता रहा और
दिन बीतते गये । राजा श्री लुणकरण जी  का  दगाबाज मुगल अमीर अली पर विश्वास बढ़ता गया और राजा लुणकरण जी दोगले अमीर अली पर बहुत ज्यादा विश्वास करने लगे ।
राजा लुणकरण जी की तलवेचाट चापलूसी कर करके उन पर अपना गहरा विश्वास जमा लेने के बाद दगाबाज अमीर अली ने एक बार राजा लुणकरण जी  से कहा की, उसकी बेगमें रनिवास की रानियों से मिलना और मुलाकात करना चाहती हैं,।
पर वह नहीं चाहता की राजमहल के कोई और पुरुष उसकी बेगमों को देखे । इस पर राजा श्री लूणकरण जी ने उससे कहा  की कुछ दिनों में, राजमहल के अधिकांश व्यक्ति एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने जायेंगे, तब किले में कोई  और पुरुष नहीं होगा, उस दिन उनकी बेगमें, उनकी रानियों से मिल सकती है।
इस पर दोगले अमीर अली ने हामी भर दी ।  ये दोगला दगाबाज मुगल अमीर अली दगा करने के लिए ऐसे ही किसी विशेष मौके की ही तो तलाश में था ।
कुछ दिनों के बाद वह दिन भी आ गया  जब महल के अधिकांश पुरुष, राजकुमार मालदेव जी भाटी के साथ विवाह समारोह में भाग लेने चले गये ।

राजा श्री लुणकरण जी ने विश्वास करके दोगले अमीर अली को संदेसा भिजवा दिया की आज उनकी बेगमें किले में आ सकती है,।
पर इस हरामी, दोगले,  दगाबाज, विश्वासघाती मुगलों की हरामी औलाद अमीर अली के मनसूबे तो कुछ और ही थे, । दगाबाज अमीर अली
असल में तो वह जैसलमेर पर कब्ज़ा करना चाहता था और उसके लिए एक अच्छे मोके का इन्तजार कर रहा था, और उसे वह अवसर मिल गया था।  वह महिलाओं की पालकियों में अपने सैनिकों को बिठा कर , और उनमें हथियार रखवा दिये, और प्रत्येक पालकी को उठाने वालों की जगह भी  अपने सैनिक लगा दिये ।
जब दोगले अमिर अली की पालकियाँ किले के प्रथम द्वार को पार कर रही थी तो, वहाँ उपस्थित राजा लुणकरण जी के एक सैनिक को उन पर शक हुआ और उसने अमीर अली की उन पालकियों की तलाशी लेने के लिये कहा ।
दोगला अमीर अली  राजा लुणकरण जी के उन सैनिकों को गच्चा देने के लिए पहले तो प्रेम पूर्वक समझाता रहा ।  पर वे सैनिक नहीं माने और पालकियों की तलाशी लेने पर अड़ गये ।
जब धोखेबाज मुगल अमीर अली को लगा कि अब ये सैनिक  पालकियों की तलाशी  लिये बगैर नहीं मानेंगे और अगर इन पालकियों की तलाशी हुई तो सारा भेद खुल जायेगा और वे पकडे जायेंगे, और किले के बाकी दरवाजे बंद हो जाएंगे । तो उस दोगले दगाबाज, विश्वासघाती,  अहसान फरामोश, वहशी, अत्याचारी  मुगल अमीर अली ने वहीं से अपने सिपाहियों को किले के द्वारपालों पर कातिलाना  हमला करने का आदेश दे दिया  । चारों ओर मारकाट शुरू हो गयी ।, अचानक हुए इस हमले से राजा लुणकरण जी के द्वाररपाल सिपाही भी कुछ समझ ही नहीं पाये और ना ही सम्मल पाये । और  जैसे तैसे किले के अंदर ख़बर पहुँचती है की दोगले अमीर अली ने
विश्वासघात कर दिया है, और किले पर हमला और मारकाट शुरू हो चूकी है ।
दोगले अमीर अली के सैनिक जो पालकियों में छिपे हुए थे
किले में निर्दयता से मारकाट मचा दी ।
पर किले में उस वक्त बहुत कम ही पुरुष थे, इसीलिए ऐसी स्थिति के कारण हमेशा की तरह, जब सिपाही कम और हार निश्चित थी तो साका किया गया।
पर एक बड़ी समस्या राजा लुणकरण जी के सम्मुख आ खड़ी हुई, कि साके में सबसे पहले जौहर किया जाता है, जिसमें वीरांगनायें  अग्नि स्नान कर लेती है ।
जौहर पूरे विधि विधान द्वारा किया जाता है, पर अब ऐसी विकट परिस्थिति में जौहर करने का समय ही नहीं बचा था । दुश्मन किसी भी वक्त किले में प्रवेश कर सकता था ।
ऐसी विकट परिस्थिति में वीरांगनाओं ने कहा की अब जौहर जितना समय नहीं हैं । अब तो उन्हें तलवारों से काट काट कर,  उनका सिर धड़ से अलग कर दिया जाए ।

इस पर वीरांगनाओं को तलवारों से काट दिया गया और इस तरह इस युद्ध में वीरांगनायें अग्नि स्नान नहीं कर पायी,  इसलिए इस युद्ध में जौहर नहीं हो पाया । वरन इसमें धारा स्नान हुआ ।, चूँकि वीरांगनायें जौहर नहीं कर पायी थी, और सिर्फ पुरुषों ने केसरिया किया था इसलिए इतिहास में इस साके को जैसलमेर का अर्धसाका  के नाम से जाना जाता है।
ये होता है दोगले, आक्रांता, अत्याचारी, व्यभिचारी, दगाबाज मुगलों पर विश्वास करने का नतीजा ।
इतिहास गवाह है और आज
पूरी दूनियाँ जानती है कि दोगले, दगाबाज मुगल कभी भी
विश्वास के काबिल ना थे, ना हैं और ना ही रहेंगे ।
दोगले,  हरामी, विश्वासघाती मुगल .अमीर अली ने धोखे और दगाबाजी करके  जैसलमेर के किले पर अपना कब्ज़ा कर लिया था ।
आज सारी दुनियाँ जानती है कि
अत्याचार, व्यभिचार, दुराचार, धोखा, दोगलापन, और दगा मुगलों के खून  और धर्म दोनों में है ।
धोखेबाज अमीर अली की धोखे से जैसलमेर के किले पर अपना कब्जा कर लेने की खबर जब  राजकुमार श्री मालदेव जी भाटी तक पहुँची  तो श्री मालदेव भाटी जी अपनी सेना लेकर आये और धोखेबाज, दगाबाज, दोगले मुगलों की हरामी औलाद अमीर अली को मारकर जैसलमेर के किले पर पुनः कब्ज़ा कर लिया ।
हमारे देश के कुछ गद्वार नेताओं द्वारा
इस सच्ची घटना को समस्त भारतवासीयों  से जानबूझकर छुपाने का एक बहुत बड़ा कुकृत्य किया  गया ।  जिससे, मुगल समुदाय पर किसी भी कीमत पर दगाबाज, धोखेबाज,  गद्दार, विश्वासघाती, कौम का टैग न लग पाए यह कौम बदनाम न होने पाए ।
इतिहास गवाह है और आज सारी दुनियाँ जानती है कि इस गद्दार और दगाबाज मुगल कौम पर कभी भी भरोसा नहीं किया जा सकता ।
मुगल विदेशी लुटेरे, अत्याचारी, आक्रांता, व्यभिचारी, अत्याचारी, दुराचारी, दोगले, दगाबाज, विश्वासघाती थे, हैं और रहेंगे ।
ऐसे कुत्सित प्रयास भारत  भूमि पर सदैव कुछ चाटुकार वामपंथी  इतिहासकारों द्वारा आज तक जारी है ।  जो कौम इतिहास से सबक नही सीखती वह सिर्फ मूर्ख ही नहीं,  कुल द्रोही है।  धर्मद्रोही और देशद्रोही समुदाय  की कठपुतली मात्र है ।
इतिहास की ऐसी अनगिनत सच्ची घटनाओं के  बाद भी अगर कोई भारतीय सनातन  हिंदू, हिन्दू संगठन, या कोई राजनैतिक पार्टीयाँ  मुगलों के इस एकता और भाईचारा के रोग से संक्रमित है
तो उन सेकुलरों का भगवान राम ही मालिक है । वो ही उनका इलाज़ कर सकते हैं ।
भारत युगों युगों से सनातन हिन्दू राष्ट्र था, हिन्दू राष्ट्र है और हिन्दू राष्ट्र ही रहेगा ।
जय हिन्द । जय भारत ॥ वन्दे मातरम् ॥
प्रस्तुति - निर्माता निर्देशक -चिरँजी कुमावत, 8619666046
Email- chiranjikumawat54@gmail.com

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