हठधर्मिता के नुकसान
किसी भी समाज में किसी की सामाजिक हठधर्मिता वह स्थिति या प्रवृत्ति है, जब कोई व्यक्ति या कोई समूह अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ वश, सामाजिक-धार्मिक विश्वासों, सामजिक कार्यों, रीति-रिवाज़ों, रूढ़ियों या दृष्टिकोणों को तर्क, प्रमाण, परिवर्तनशील परिस्थितियों तथा दूसरों की वैध एवं सामाजिक हित एवं सामाजिक भावनाओं के अनुरूप ढालने से अड़ियल-ढंग से इनकार कर देता है। इसे सरल शब्दों में “सामाजिक (समाज से जुड़ी) + हठ (ज़िद) + धर्मिता (आस्था-आधारित कठोरता)” का संयुक्त रूप समझ सकते हैं।
मुख्य लक्षण
1. परिवर्तन-विरोधी रवैया
– नई जानकारी, वैज्ञानिक निष्कर्ष या समाज में आई सकारात्मक प्रगतियों को स्वीकार करने से इंकार।
2. आलोचना-अस्वीकार
– मान्यताओं के तर्कसंगत विश्लेषण या प्रश्न उठाने पर व्यक्तिगत या सामूहिक प्रतिरोध, कभी-कभी आक्रामकता।
3. अनावश्यक सामाजिक-दबाव
– समूह-विशेष के नियम न मानने वालों को सामाजिक बहिष्कार, दोषारोपण या दंड की धमकी।
4. आत्मनिहित श्रेष्ठता-भाव
– यह विश्वास कि हमारी परंपरा या विचार ही सर्वश्रेष्ठ और शाश्वत हैं; इसलिए अन्य को बदलना चाहिए, स्वयं को नहीं।
5. संकीर्णता व असहिष्णुता
– वैकल्पिक जीवन-शैलियों, धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं या सांस्कृतिक विविधताओं के प्रति असहिष्णु रुख।
दुष्प्रभाव
व्यक्तिगत-स्वतंत्रता पर अंकुश – व्यक्ति के सोचने-समझने और फैसले लेने की स्वतंत्रता बाधित हो जाती है।
सामाजिक प्रगति में अवरोध – शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, वैज्ञानिक नवाचार जैसे क्षेत्रों में सुधार धीमा होता है।
टकराव व विभाजन – विभिन्न समुदायों/पीढ़ियों के बीच संघर्ष, कटुता और ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।
दबाव और हानि – अनुचित परंपराओं, दम्भी प्रवृत्ति के कारण चलते कमजोर वर्ग विशेष रूप से हानि उठाते हैं।
कैसे कम करें
1. शिक्षा व तर्कपूर्ण संवाद – तथ्यों, इतिहास और विज्ञान आधारित चर्चा से दृष्टिकोण बदलने का प्रयास।
2. सकारात्मक उदाहरण – परिवर्तन अपनाने वाले व्यक्तियों/समुदायों की सफलता कथाएँ साझा करना।
3. कानूनी व नीतिगत सुधार – कठोर रूढ़ियों के दुष्प्रभाव रोकने के लिए उचित कानूनों का क्रियान्वयन।
4. सांस्कृतिक संवेदनशीलता – परंपरा का सम्मान रखते हुए धीरे-धीरे व्यवहारिक व मानवीय बदलाव पर जोर।
5. युवा और महिला सहभागिता – नई और युवा पीढ़ी को आलोचनात्मक सोच व सहिष्णुता के मूल्यों से लैस करना।
संक्षेप में, कुछ लोगों की अपने निजी स्वार्थवश, सामाजिक हठधर्मिता किसी भी समाज की वह जड़ता है जो उसे अपने ही तर्कहीन नियमों-रूढ़ियों में जकड़ कर रखती है। इसे घटाने के लिए शिक्षा, संवाद, कानून तथा सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण—सभी की समन्वित एवं सामूहिक सहभागिता, हिस्सेदारी एवं सामूहिक भूमिका आवश्यक होती है।
प्रस्तुति - निर्माता निर्देशक -चिरँजी कुमावत, 8619666046
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