स्वतंत्रता सेनानी, सदस्य - भारतीय संविधान सभा, पद्मश्री डॉ. रत्नप्पा भरमप्पा कुम्हार
डॉ रत्नाप्पा भरमप्पा जी कुम्हार ,(1909 - 1998) एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे, जो भारतीय संविधान सभा के सदस्य तथा उसके सचिव चुने गए थे। उन्हें देशभक्त डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार के नाम से भी जाना जाता है। वह श्री भीमराव जी अम्बेडकर के साथ भारत के
संविधान के अंतिम मसौदे पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों में से एक थे।
डॉ . रत्नप्पा जी कुम्हार, स्वतंत्रता सेनानी, भारतीय संविधान सभा के सदस्य, पूर्व सांसद, महाराष्ट्र सरकार के पूर्व गृह, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री, महाराष्ट्र विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष थे। भारत सरकार ने उनके सामाजिक कार्य के लिए 1985 में उन्हें पद्मश्री की उपाधि से सम्मानित भी किया गया था।
देशभक्त, पद्मश्री डॉ. रत्नप्पा जी कुम्हार भारतीय संविधान सभा के एक सदस्य थे। वह एक समाज सुधारक और राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने विशेष रूप से पिछड़े और कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए काम किया था । संविधान निर्माण के दौरान, उन्होंने कृषि, ग्रामीण विकास और समाज के वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों के लिए अपनी आवाज पुरजोर तरीके से उठाई थी।
डॉ. रत्नप्पा जी कुम्हार ने भारतीय संविधान सभा के
सदस्य के रूप में समाज के पिछड़े वर्गों को न्याय और समानता प्रदान करने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। उनकी भूमिका विशेष रूप से सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रावधानों को मजबूत बनाने में रही। उनकी सोच और योगदान ने भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय के उद्देश्यों को साकार करने में मदद की।
डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार की प्रतिबद्धता और दूरदर्शिता ने उन्हें भारत के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में एक सम्मानित स्थान दिलाया था।
डॉ. रत्नप्पा जी कुम्हार एक महान स्वतंत्रता सेनानी, कोल्हापुर जिले में सहयोग और हरित क्रांति के अग्रदूत, शिक्षा परिषद के संस्थापक अध्यक्ष थे । पद्मश्री डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार को महाराष्ट्र में सरकारी आन्दोलन का पुरोधा कहा जा सकता है ।
राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भारत की सबसे प्रबल आकश्यकता सामाजिक न्याय की स्थापना की थी । जिसे अमलीजामा पहनाने के लिए उपर्युक्त महापुरुषों सहित डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार भी पूरी ऊर्जा व निष्ठ से लगे हुये थे ।
संविधान की उद्देशिका में वर्णित समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, देश, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय के परिप्रेक्ष्य में धर्म से लिंगायती एवं जाति से पिछड़े डॉ रत्नप्पा कुम्हार ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था ।
# जीवनी
डॉ. रत्नप्पा भरमप्पा जी कुम्हार का जन्म महाराष्ट्र के कोल्हापुर में अवस्थित शिरोल तहसील के अन्तर्गत निमशिर गाँव में 15 सितम्बर 1909 को एक निर्धन कुम्हार परिवार में हुआ था।
डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार के पिता श्री भरमप्पा जी कुम्हार व माता श्रीमती गंगूबाई जी कुम्हार मिटटी एवं खेती बाडी दोनों प्रकार का कार्य करके बड़ी कठिनाई से अपनी आजीविका चलाते थे । घर और गाँव की यही स्थिति देखकर बचपन में ही बालक रत्नप्पा जी के मन में गाँव गरीब, मजदूर और किसानों के प्रति हमदर्दी के बीज
पनपे ।
रत्नप्पा जी कुम्हार के माता पिता शिक्षा के महत्व से भली भांति परिचित थे । फलतः बालक रत्नप्पा जी को गाँव के प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश दिलवा दिया गया । गाँव में केवल प्राथमिक स्तर तक का ही विद्यालय होने के कारण आगे की पढ़ाई के लिए इन्हें पास के नगर हात कणगले के उच्च विद्यालय में भेजा गया ।
तदुपरान्त सन् 1928 में अपनी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात उच्च शिक्षा के लिए कोल्हापुर के राजाराम
कॉलेज में प्रेवश लिया और यहीं से इन्होंने सन् 1933 में बीए की डिग्री प्राप्त की ।
रत्नप्पा कुम्हार जी ने ये उपाधि राजर्षि शाहूजी महाराज द्वारा स्थापित "वीर शैव" छात्रावास में रहकर प्राप्त की, जिस कारण सामाजिक न्याय की अवधारणा का जरूरी बीजांकुर इनमें हुआ ।
स्नातक के बाद रत्नप्पा जी कुम्हार ने आगे अपने वकालात की पढ़ाई शुरू कर दी और इसी दौरान सन् 1934 में इनका विवाह मिराज ताल्लुके के अन्तर्गत गुंडेवाड़ी गाँव की गुणवती युवती पार्वती बाई से हो गया, जिससे इन्हें सुघड़ सुशील तीन कन्यायें प्राप्त हुई ।
डॉ. रत्नप्पा जी कुम्हार के तीन पुत्रियों में बड़ी पुत्री के मंगल पाटिल जी हैं जिनका विवाह श्री सिद्धराम जी पाटील से हुआ, दूसरी पुत्री रजनी ताई जी मगदूम हैं जिनका विवाह डाॅ. विश्वनाथ जी मगदूम के साथ हुआ । तथा तीसरी पुत्री कल्पना कुम्हार जी हैं जिनका विवाह श्री बालासाहेब जी कुम्हार से हुआ ।
वकालात की पढ़ाई को रत्नप्पा कुम्हार के जीवन टर्निंग पाइंट कह सकते हैं । अपने गृहस्थ जीवन में कदम रखने के पश्चात स्वतंत्रता सेनानी व पत्रकार श्री माधवराव जी बागल की काश्तकारी रिपोर्ट पर उनके द्वारा दिये गए प्रेरक भाषण को सुनकर रत्नप्पा जी कुम्हार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गये । और गाँव गाँव और शहर शहर जाकर इन्होंने आजादी की अलख जगाई ।
जातीय, धार्मिक, क्षेत्रीय आदि भेद भाव भूलकर व सामन्ती मानसिकता से दूर होकर सबको एक एवं संगठित होने का
संदेश दिया । विशेषकर गरीब, मजदूर और किसानों के कल्याणार्थ रत्नप्पा जी कुम्हार का कार्य अविस्मरणीय है ।
15 फरवरी 1938 को गरीब, किसानों मजदूरों के हक अधिकार और हितों की लड़ाई, रियासतों के एकीकरण एवं भारत की ब्रिटिश राज से मुक्ति के ज्वलन्त उद्देश्य से इन्होंने कोल्हापुर में अपने वरिष्ठ साथियों श्री माधवराव जी बागल व श्री दिनाकर जी देसाई के साथ मिलकर प्रजा परिषद नामक संगठन बनाया । जल्द ही इस संगठन ने अपनी गतिविधियों से ब्रिटिश राज और स्थानीय राजा की नींद हराम कर दी । इस कारण कोल्हापुर नरेश ने रत्नप्पा जी कुम्हार को 8 जुलाई 1939 को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया ।
इनकी प्रजा परिषद की प्रबल प्रभाव था कि उस क्षेत्र की 21 रिसायतों ने इस संगठन के बैनर तले ख़ुद का भारतीय गणराज्य में विलय कर लिया था। प्रजा परिषद के नेता व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य होने के परिणाम स्वरूप रत्नप्पा जी कुम्हार स्थानीय शासक व ब्रितानी हुकूमत के जी का जंजाल बन चुके थे ।
कहते हैं कलम तलवार से ज्यादा मारक और घातक होती है । इतिहास गवाह है कलम ने बडे बडे तानाशाहों की तलवारों को भौंथरा साबित कर उन्हें नेस्तनाबूद किया है । यही कारण था कि रत्नप्पा जी कुम्हार ने सर्वप्रथम अंग्रेजी एवं शाही प्रचार तंत्र और समाचार उपक्रमों पर लेखकीय व वैचारिक हमला बोला । रत्नप्पा जी कुम्हार ने गाँव गांव घूम घूमकर इनके विरुद्ध वातावरण तैयार किया एवं साथ ही इस रिक्ति को भरने के लिए खुद की वैकल्पिक समाचार व्यवस्था कायम की ।
सन् 1961 में इनकी यही उद्यमिता नवमहाराष्ट्रा कॉ आपरेटिव प्रिंटिंग एवं पब्लिकेशन सोसाइटी लिमिटेड के रूप में साकार हुई ।
20 दिसम्बर 1943 में मिराज के नजदीक मालगाँव में रत्नप्पा जी कुम्हार की अध्यक्षता में तीन दिनों तक एक गुप्त बैठक चली । इस बैठक में उपस्थित सदस्यों द्वारा एक सामूहिक निर्णय लिया गया कि बरसी रेलवे स्टेशन से गुजरने वाली डाक गाडी को लुट लिया जाए । इस योजना को सफलता पूर्वक अंजाम दिया गया । सभी क्रांन्तिकारियों ने अपने नेता रत्नप्पा जी कुम्हार के नेतृत्व में 29 दिसम्बर 1943 को बरसी रेलवे स्टेशन पर उक्त डाकगाड़ी को लूट लिया । रत्नप्पा जी कुम्हार की इस कारगुजारी से अंग्रेजी सरकार भडक उठी ।
अंग्रेजी सरकार ने रत्नप्पा जी कुम्हार को पकड़ने के लिए अपनी पूरी पुलिस फोर्स लगा दी । स्थिति और अंग्रेजों की नीयत भाँपकर रत्नप्पा जी कुम्हार भी अब तक भूमिगत हो चुके थे । अंग्रेजी सरकार ने रत्नप्पा जी कुम्हार को पकड़ने के लिए इन पर उस समय बीस हजार रुपये का नकद इनाम रखा था । परन्तु अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद भी अंग्रेज रत्नप्पा जी को 6 साल तक पकड़ नहीं पाए और इसी दौरान स्वतंत्रता सेनानियों के प्रयासों व जनान्दोलनों के दबाव में देश आजाद हो गया । श्री रत्नप्पा जी कुम्हार आजाद थे और आजाद ही रहे ।
15 अगस्त 1947 को जुल्मी और अत्याचारी फिरंगी अंग्रेजी सल्तनत ने विवश, हताश और मजबूर होकर भारत को अपनी क्रूर जकड़ से आजाद करने की घोषणा कर दी ।
पर स्वतंत्रता के बाद भारतीयों के सामने एक और बड़ी समस्या अपना विकराल मुंह बाए खड़ी थी, वह थी आजाद भारत का संविधान बनाने की समस्या ।
संविधान निर्माण का कार्य शुरू हुआ । इस राष्ट्रव्यापी, राष्ट्र निर्माणी, राष्ट्रोत्थानक विधायी ग्रंथ के निर्माण में बाबा साहब अंबेडकर जी अपनी पूरी निष्ठा व लग्न से जुट गए । परन्तु इतने विशाल देश के विशाल विधान की सृजना हेतु उन्हें कुछ सुयोग्य व सच्चे सहयोगियों की आवश्यकता थी । उनकी इस आवश्यकता की पूर्ति में एक बहुत ही महत्वपूर्ण नाम जुड़ा, वह था पद्मश्री डॉ. रत्नप्पा भरमप्पा जी कुम्हार का । डॉ रत्नप्पा भरमप्पा जी कुम्हार ने संविधान सभा की सदस्यता ग्रहण करने के उपरान्त बाबा साहब अम्बेडकर ज़ी का संविधान निर्माण में अनवरत सहयोग किया । इस तथ्य का सबसे प्रमाणित और पुख्ता प्रमाण यह है कि भारत के संविधान के अंतिम मसौदे पर बाबा साहब अम्बेडकर जी के साथ डॉ. रत्नप्पा जी कुम्हार के भी हस्ताक्षर मौजूद हैं ।
असल में देश की आजादी के लिए डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार का संघर्ष उनके जीवन का केवल पूर्वार्द्ध है । इनके जीवन का उतरार्द्ध तो और भी अधिक ओजस्वी, संघर्षी .व उद्देश्य पूर्ण है । देश की आजादी के बाद इनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व और अधिक निखरा व देश हित की संकल्पना में और अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ ।
देश अभी केवल विदेशी व देशी राजसताओं से आजाद हुआ था । इसे अभी राजशाही और तानाशाही की मानसिकताओं से भी मुक्त करवाना था । इन सामन्ती मानसिकताओं पर निर्णायक हमले के रूप में प्रहार देश को संवैधानिक रूप से लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करके किया गया था । रत्नप्पा जी कुम्हार को एक तरह से कार्यभार मिल चुका था और ये पुनः अपने उद्देश्य की पूर्ति में जुट गये थे । रत्नप्पा जी कुम्हार ने न केवल लोकतांत्रिक गणराज्य की अवधारणा समझायी, बल्कि उन्हें मानसिक रूप लोकतांत्रिक भी बनाया ।. रत्नप्पा जी कुम्हार का सहकारी आन्दोलन संविधान की मूल भावना समता, स्वतंत्रता व बन्धुत्व की झांकी ही है ।
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डॉ रलप्पा जी कुम्हार एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने कोल्हापुर क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उनके लंबे समर्पण के कारण, उन्हें देशभक्त रत्नप्पा जी कुंभार भी कहा जाता था।
राजनीतिक कैरियर
आज़ादी के बाद, 26 जनवरी1950 को भारत में संविधान की स्थापना के उपरान्त डॉ रत्नप्पा जी कुंभार कोल्हापुर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से पहली लोकसभा के लिए सांसद चुने गए। उनकी लोक प्रियता का आलम ये था कि लोग
उन्हें देशभक्त रत्नप्पा कुम्हार के नाम से सम्बोधित करते थे
और उनकी लोकप्रियता के कारण ये मृत्यु पर्यंत एक निर्वाचित जन प्रतिनिधी रहे ।
सन् 1952 में लोकसभा सांसद बने,
1962, 1967, 1972,1978 तक लगातार चार बार कोल्हापुर में स्थित शिरोल विधान सभा से विधायक रहे ।
1974 से 1978 तक महाराष्ट्र सरकार में गृह, खाद्य और नागरिक आपूर्ति राज्यमंत्री रहे । 1982 में एक बार उन्हें विधायक का चुनाव हारना भी पड़ा था । पर 1990 में शिरोल की जनता ने अपने इस सर्वप्रिय नेता को फिर से विधायक चुन लिया ।
1985 में रत्नप्पा जी कुम्हार को इनके सामाजिक कार्यों एवं इनकी राष्ट्रभक्ति के लिए तत्कालीन भारत सरकार ने इन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। और इसी वर्ष इनकी जनसेवा के लिए सावित्री बाई फुले विद्यापीठ पुणे विश्व विधालय ने इनको डी. लिट की मानद उपाधि . प्रदान की ।
डॉ. रत्नप्पा जी कुम्हार ने कोल्हापुर के शिरोल और हटका नांगल तहसील की औद्योगिक और कृषि समृद्धि लाने में बहुत ही बडी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
सन् 1995 में डॉ. रत्नप्पा जी कुम्हार को इनके अनुभव, ज्ञान, एवं सदाशयता के कारण इन्हें महाराष्ट विधान सभा का अध्यक्ष चुना गया ।
डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में गरीबों, शोषितों, पिछड़ों एवं किसानों के कल्याण और लोगों की समृद्धि के लिए उन्होंने विभिन्न योजनाएं शुरू कीं और विभिन्न संगठन स्थापित किए और उनका सफलतापूर्वक संचालन किया- जिनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं ।
उन्होंने महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन और शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ी एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देशभक्त डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार ने 1933 में शाहाजी लॉ कॉलेज, 1955 में पंचगंगा कोऑपरेटिव सुगर फैक्टरी, 1957 में डॉ. रत्नप्पा कुम्भार कॉलेज ऑफ कॉमर्स, 1960 में दादा साहेब मग्दम हाई स्कूल, 1961 में नव महाराष्ट्रा कोऑपरेटिव प्रिंटिंग एवं पब्लिकेशन सोसाइटी लिमिटेड, 1963 में कोल्हापुर जनता सेंट्रल को-ऑपरेटिव कंज्यूमर स्टोर्स, 1963 में रत्नदीप हाई स्कूल, इचलकरांजी, 1968 में कोल्हापुर जिला शेतकारी वींणकारी सहकारी सूत गिरानी लिमिटेड, इचलकरांजी, 1971 में नाइट कॉलेज ऑफ आर्ट्स ऐंड कॉमर्स कोल्हापुर और 1975 में कोल्हापुर एल्यूमिना इंडस्ट्री (1975) की स्थापना की।
देशहित के तमाम क्षेत्रों में अपनी वाचा, कर्मणा और चिन्तन की आभा बिखेर कर भारत का ये सच्चा सपूत
23 दिसंबर 1998 को 89 वर्ष की उम्र में डॉ. रत्नप्पा जी कुम्हार की हार्ट अटैक की वजह से मृत्यु हो गई ।
डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार भारत की इसी मिटटी में सदा के विलीन हो गये ।
पद्मश्री डॉ रत्नप्पा जी कुम्हार जैसी महान शख्सियत के नाम के साथ ये उपाधियाँ उनके संघर्ष, जज्बे, जुनून और राष्ट्रभक्ति की एक बानगी भर है ।
पद्मश्री डॉ. रत्नप्पा जी कुम्हार जितने आज़ादी के परवाने के रूप में महत्वपूर्ण, उपयोगी एवं उद्योगी थे, उतने ही आजादी के पश्चात लोकप्रिय जन प्रतिनिधि के रूप में लोकहितकारी एवं जन हितैषी सिद्ध हुए ।
ऐसे महापुरुष युगों युगों के बाद ही,लोक कल्याण के लिए इस भारत भूमि पर जन्म लेते हैं और अपने कार्यों के कारण लोगो के दिलों में सदा सदा के लिए अमर हो जाते हैं ।
जय हिन्द ॥ जय भारत ॥ वन्दे मातरम् ॥
प्रस्तुति -निर्माता निर्देशक - चिरँजी कुमावत, 8619666046
Email-chiranjikumawat54@gmsil.com
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