श्री गोवर्धन जी की पूजा की कथा
श्री गोवर्धन जी की पूजा की कथा
क्या आप श्री गोवर्धन जी की पूजा की अद्भुत कथा के बारे में जानते हैं? तो आइये आज जानते हैं कैसे भगवान श्री कृष्ण जी ने श्री गोवर्धन पर्वत की रक्षा की और इसके पीछे की प्रेरक कहानी!
श्री गोवर्धन जी की पूजा की कथा
दिवाली के बाद पूरे देश में श्री गोवर्धन जी की पूजा बड़ी ही श्रद्धापूर्वक एवं धूम धाम से मनाई जाती है। यह त्यौंहार काफी ख़ास है, क्योंकि इसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण जी से है। आइये इस कथा के माध्यम से हम आपको बताते हैं कि इस पर्व की शुरूआत कैसे हुई और इसका भगवान श्रीकृष्ण जी से इसका क्या संबंध है ?
द्वापर युग में एक बार देवराज श्री इंद्र देव जी को अपनी शक्तियों के ऊपर काफ़ी अहंकार हो गया था। उनका यह अभिमान तोड़ने के लिए भगवान श्रीकृष्ण जी ने बड़ी ही अद्भुत लीला रची थी।
एक दिन भगवान श्रीकृष्ण जी ने देखा कि ग्रामवासी किसी पूजा की तैयारी में व्यस्त हैं और स्वादिष्ट पकवान बना रहे हैं। यह देखकर भगवान श्रीकृष्ण मैया यशोदा जी से पूछते हैं कि, माँ यहां सब लोग किसकी पूजा की तैयारियों में व्यस्त हैं?
भगवान श्रीकृष्ण जी की बातें सुनकर माता यशोदा जी उत्तर देती हैं और बताती हैं कि, गांव के सभी लोग, देवराज श्री इंद्रदेव जी की पूजा में व्यस्त हैं।
भगवान श्री कृष्ण जी आगे पूछते हैं कि उनकी पूजा क्यों की जाती है? तो माता यशोदा जी उन्हें बताती हैं कि, यह पूजा देवराज श्री इंद्रदेव जी को प्रसन्न करने के लिए की जाती है, जिससे गांव में अच्छी वर्षा होती रहे और खेतों में फसलें लहलहाती रहें, खेतों में अन्न- धान्य उपजता रहे ।
जिससे कभी भी अन्न-धान्य की कमी न हो। गांववासियों के साथ यहां के पशुओं का भी भरण-पोषण इस अन्न-धान्य से ही होता है।
इस बात पर भगवान श्री कृष्ण जी ने कहा कि फिर तो इंद्र देव की जगह श्री गोवर्धन पर्वत की पूजा होनी चाहिए, क्योंकि गायों को चारा वहीं से मिलता है। इंद्रदेव तो कभी प्रसन्न नहीं होते हैं और न ही दर्शन देते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण जी की यह बात बृज के अन्य लोगों को भी पता लगी और उन्होंने कान्हा की बात मानकर श्री इंद्र देव जी की जगह श्री गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू कर दी।
यह देखकर देवराज श्री इंद्र देव जी अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। देवराज श्री इंद्रदेव जी ने इतनी वर्षा की कि उस से बृज वासियों को फसल के साथ काफी नुकसान हो गया।
वर्षा न रुकने और लगातार मूसलाधार वर्षा होते रहने पर सभी बृजवासी भगवान श्रीकृष्ण जी की शरण में पहुंचे और उनसे रक्षा की प्रार्थना करने लगे। भगवान श्रीकृष्ण जी ने सभी बृजवासियों को देवराज श्री इंद्रदेव के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा श्री गोवर्धन पर्वत ही उठा लिया। उन्होंने बृज के सभी लोगों से अपने गाय, बछड़े और अन्य पशुओं समेत पर्वत के नीचे शरण लेने के लिए कहा।
देवराज श्री इंद्रदेव जी भगवान श्रीकृष्ण जी की यह लीला देखकर और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने वर्षा की गति को और तीव्र कर दिया। तब भगवान श्री कृष्ण जी ने अपने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप श्री गोवर्धन पर्वत के ऊपर विराजमान होकर वर्षा की गति को नियंत्रित करें और शेषनाग जी से कहा कि आप मेड़ बनाकर पानी को श्री गोवर्धन पर्वत की ओर आने से रोकें।
देवराज श्री इंद्र देव जी लगातार सात दिन तक भयंकर तेज वर्षा करते रहे तब ब्रह्मा जी ने देवराज श्री इंद्र देव जी से कहा कि श्री कृष्ण भगवान विष्णु जी के अवतार हैं और उन्हें भगवान श्री कृष्ण जी की पूजा की सलाह दी। ब्रह्मा जी की बात सुनकर देवराज श्री इंद्र देव जी ने भगवान श्री कृष्ण जी से क्षमा मांगी और उनकी पूजा करके अन्नकूट का 56 तरह का भोग लगाया। तभी से श्री गोवर्धन पर्वत पूजा की जाने लगी और भगवान श्री कृष्ण जी को प्रसाद में 56 भोग चढ़ाया जाने लगा।
श्री गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पूजा के रूप में भी जाना जाता है।
श्री गोवर्धन पूजा का क्या महत्व है?
श्री गोवर्धन पूजा में गायों की पूजा का भी विशेष महत्व है । इस दिन भगवान श्री कृष्ण जी ने वृंदावन के लोगों को वर्षा देवता श्री इंद्र देव जी के प्रकोप से बचाने के लिए एक दिव्य कार्य किया था । इस बार श्री गोवर्धन पूजा शनिवार, 02 नवंबर को मनाया जाएगा, क्योंकि कार्तिक अमावस्या 01 नवंबर तक रहने वाली है ।
गोवर्धन पूजा के पीछे क्या कहानी है?
जब भगवान श्री कृष्ण जी ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचाने के लिए सात दिन तक श्री गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उँगली पर उठाकर रखा और गोप-गोपिकाएँ उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने श्री गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और प्रतिवर्ष श्री गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से भी मनाया जाने लगा।
श्री गोवर्धन पूजा वाले दिन क्या नहीं करना चाहिए?
श्री गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट बंद कमरे में न बनाएं। इस दिन चंद्रमा (चंद्रदोष उपाय)भूलकर भी नहीं देखना चाहिए। श्री गोवर्धन पूजा के दिन गाय की पूजा करना न भूलें। इस दिन गंदे कपड़े पहनकर श्री गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा न करें।
श्री गोवर्धन गोबर से क्यों बनता है?
जिस जगह पर गाय का गोबर रखा जाता है, वह जगह सबसे शुद्ध मानी जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि गाय में सभी देवी-देवता निवास करते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि धन की देवी श्री लक्ष्मी जी गाय के गोबर में निवास करती हैं।" इसलिए, श्री गोवर्धन पर्व मनाने वाले भक्त जन गाय के गोबर से प्रतीक स्वरूप श्री गोवर्धन जी बनाते हैं।
गोवर्धन पूजा में गाय के गोबर का उपयोग क्यों किया जाता है?
ऐसा माना जाता है कि गाय का गोबर किसी जीव के जीवन चक्र का एक चमत्कारी इनाम माना जाता है, जो एक बार फिर जीवन के विकास के लिए मरता है और पुनर्जन्म लेता है । यह स्पष्ट रूप से हिंदू अनुष्ठानों में
" श्री गोवर्धन पूजा" के रूप में की जाने वाली पूजा से देखा जाता है। ... गाय को माता और यहां तक कि भगवान के रूप में भी माना जाता है।
गाय का गोबर पवित्र क्यों है?
धार्मिक मान्यता है कि गाय के गोबर में माता श्री लक्ष्मी जी का वास होता है । भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के संस्कार और संस्कृति तथा शास्त्रों में गाय के मुख वाले भाग को अशुद्ध और पीछे वाले भाग को शुद्ध माना गया है, इसलिए गाय के गोबर, गोमूत्र और दूध सभी उपयोगी होते हैं । वास्तु शास्त्र के अनुसार, गाय के गोबर के कंडे जलाने पर जो धुआं होता है उसे बहुत पवित्र माना गया है ।
प्रस्तुति निर्माता निर्देशक चिरँजी कुमावत, 8619666046,
Email-chiranjikumawat54@gmail.com
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