आखिर क्यों मनाया जाता है दिवाली का त्यौंहार ? जानें इसके पीछे का पौराणिक महत्व ।
आखिर क्यों मनाया जाता है दिवाली का त्यौंहार ? जानें इसके पीछे का पौराणिक महत्व
हर साल दिवाली का त्यौंहार कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है । इस बार दिवाली 2024 को 31 अक्टूबर को मनायी जा रही है। दिवाली के दिन माता लक्ष्मी जी और भगवान गणेश जी की पूरे विधि विधान से पूजा की जाती है । लेकिन भारतीय सनातन धर्म संस्कार और संस्कृति में दिवाली को मनाने के पीछे क्या कारण है, आइए जानते हैं ।
भारतीय सनातन धर्म संस्कार और संस्कृति में दिवाली सबसे महत्वपूर्ण त्यौंहार माना जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी जी और भगवान गणेश जी की पूजा का विधान है।
भारतीय सनातनी हिन्दू धर्म के लोग दिवाली के दिन मां लक्ष्मी जी एवं भगवान गणेश जी की पूजा करते हैं । कहा जाता है कि धन की देवी मां लक्ष्मी जी इस दिन सबके घर में प्रवेश करती हैं जहाँ परिवार में प्रेम -भाव, मान- सम्मान और एक दूसरे के प्रति श्रद्वा होती है ऐसे घर में माँ लक्ष्मी जी अपना स्थाई निवास कर लेती हैं । जिस घर में कलह रहती है, परिवार में प्रेम भाव और एक दूसरे के प्रति मान सम्मान और श्रद्धा भाव नहीं होता ऐसे घर में माँ लक्ष्मी जी स्थाई रूप से अपना निवास नहीं करती । भारतीय धर्म शास्त्रों के अनुसार श्रीहरि ने नरकासुर का संहार किया था। इसलिए इस दिन समृद्धि की प्रतीक मां लक्ष्मी जी और ज्ञान के प्रतीक श्रीगणेश जी की विधि विधान से की पूजा की जाती है ।
कई लोग दिवाली को भगवान विष्णु जी की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी माँ लक्ष्मी जी से जुड़ा हुआ मानते हैं। दिवाली का पांच दिवसीय महोत्सव देवताओं और राक्षसों द्वारा दूध के लौकिक सागर के मंथन से पैदा हुई माँ लक्ष्मी जी के जन्म दिवस से शुरू होता है।
इस कथा को समझाने के लिए हमें हिंदू पौराणिक कथाओं का संदर्भ लेना होगा।
भारतीय सनातन हिन्दू धर्म के शास्त्रों के अनुसार भारत में प्रचलित मान्यता है कि, जब भगवान राम जी अपने चौदह साल के वनवास खत्म होने एवं रावण का वध करके उनपे विजय करने के बाद जब अयोध्या लौटे, तो सबसे पहले उन्होंने भगवान श्री गणेश जी और देवी माँ लक्ष्मी जी की पूजा की थी ।
तब से दिवाली पर माँ लक्ष्मी जी और श्री गणेश जी की पूजा करने की परंपरा शुरू हुई। तब भारत के लोगों ने राम जी के चौदह साल के वनवास काटने के बाद अयोध्या आगमन पर रंगोली बनाकर दीप जलाकर खुशियाँ मनायी थी।
दिवाली पर माँ लक्ष्मी जी और भगवान श्री गणेश जी की पूजा क्यों की जाती है?
यह पवित्र अनुष्ठान प्रचुरता की ब्रह्मांडीय ऊर्जा में विश्वास को मजबूत करता है और हमें अपने जीवन में प्राप्त आशीर्वाद के लिए आभारी होने की याद दिलाता है। देवी लक्ष्मी जी की दिव्य कृपा उन सभी के लिए समृद्धि, खुशी और पूर्णता लाए जो श्रद्धा और विश्वास के साथ दिवाली मनाते हैं।
अन्य कई पौराणिक कथायें और दिवाली
श्री राम 14 साल के वनवास के बाद लौटे थे
रामायण के मुताबिक, भगवान श्रीराम जी जब लंकापति रावण का वध करके माता सीता जी और भाई लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या वापस लौटे तो उस दिन पूरी अयोध्या नगरी मारे खुशी के रंगोली और दीपों से सजी हुई थी । कहते हैं कि भगवान राम जी के 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या आगमन पर दिवाली मनाई गयी थी । हर नगर हर गांव में दीपक जलाए गए थे. तब से दिवाली का यह पर्व अंधकार पर विजय का पर्व बन गया ।
श्रीकृष्ण के हाथों नरकासुर का वध
भगवान श्रीकृष्ण जी ने अपनी पत्नी सत्यभामा की मदद से असुर राजा नरकासुर का वध किया था. नरकासुर को स्त्री के हाथों से वध का श्राप मिला हुआ था। उस दिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि थी । नरकासुर के आतंक और अत्याचार से मुक्ति मिलने की खुशी में लोगों ने दीपोत्सव मनाया था। इसके अगले दिन दिवाली मनाई गई थी ।
पांडवों की घर वापसी
दिवाली को लेकर एक कथा पांडवों के घर लौटने को लेकर भी है । याद दिला दें कि पांडवों को भी वनवास छेलना पड़ा था, जिसके बाद पांडव घर लौटे और इसी खुशी में पूरी नगरी को जगमग किया गया और तभी से दिवाली की शुरूआत हुई ऐसी किवदन्ती है ।
मां लक्ष्मी जी का अवतार
दिवाली से संबंधित एक कथा और जुड़ी हुई है कि समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी जी ने सृष्टि में अवतार लिया था । यह भी मुख्य कारणों में से एक है । माता लक्ष्मी जी को धन और समृद्धि की देवी माना जाता है. इसीलिए हर घर में दीप जलने के साथ-साथ हम माता लक्ष्मी जी की पूजा भी करते हैं । यह भी दीपावली मनाने का एक मुख्य कारण है ।
विदेशी आक्रमणकारी, अत्याचारी, लुटेरे दोगला मुगल जहांगीर
विदेशी आक्रमणकारी, अत्याचारी, लुटेरे दोगले मुगल जहांगीर ने सिखों के 6वें गुरु गोविंद सिंह सहित 52 राजाओं को धोखे से ग्वालियर के किले में बंदी बना लिया था। जब गुरु गोविंद सिंह जी को कैद से आजाद किया जाने लगा तो वे अपने साथ कैद हुए सभी राजाओं को भी रिहा करने की मांग करने लगे । गुरू हरगोविंद सिंह जी की जिद के आगे दोगले मुगल जहांगीर को झुकना पड़ा और जबरन कैद किये गये अन्य सभी राजाओं को भी कैद से रिहा किया गया था । इसलिए इस त्यौंहार को सिख समुदाय के लोग भी बडे धूमधाम से मनाते हैं.
अंतिम हिंदू सम्राट की जीत
अंतिम हिंदू सम्राट राजा विक्रमादित्य की कहानी भी दिवाली के साथ जुड़ी हुई है। राजा विक्रमादित्य प्राचीन भारत के एक महान सम्राट थे । वे एक बहुत ही आदर्श राजा थे और उन्हें उनके उदारता, साहस तथा विद्वानों के संरक्षणों के कारण हमेशा जाना जाता है । इसी कार्तिक अमावस्या को उनका राज्याभिषेक हुआ था। राजा विक्रमादित्य, विदेशी आक्रमणकारी, अत्याचारी लुटेरों को धूल चटाने वाले भारत के अंतिम हिंदू सम्राट थे ।
मां काली का रौद्र रूप
एक और कथा के अनुसार माता पार्वती ने राक्षस का वध करने के लिए जब महाकाली का रूप धारण किया था ।उसके बाद उनका क्रोध शांत नहीं हो रहा था। तब महाकाली का क्रोध शांत करने के लिए भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए थे । तब भगवान शिव के स्पर्श से उनका क्रोध शांत हुआ था। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई । इसी रात इनके रौद्ररूप काली की पूजा का भी विधान है ।
प्रस्तुति- निर्माता निर्देशक -चिरँजी कुमावत, Mo. 8619666046
Email-chiranjikumawat54@gmail.com
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