राजस्थान का एक अजेय महायोद्धा महाराजा सूरजमल जी जाट
राजस्थान का एक अजेय महायोद्धा, महाराजा श्री सूरजमल जी जाट
महाराजा श्री सूरजमल जी जाट के पिता का नाम श्री बदन सिंह जी (महेन्द्र जी) था। वे ब्रज के डीग राज्य के सिनसिनवार गौत्र के जाट महाराजा थे और माता का नाम श्रीमती रानी देवकी जी था, जो कामा (कॉमर) के अखैराम चौधरी जी (जाट) की पुत्री थी। महाराजा श्री सूरजमल जी का जन्म विदेशी लुटेरे, अत्याचारी, आक्रांता हरामी, मुगल औरंगजेब की मौत वाले दिन 13 फरवरी 1707 को हुआ था।
सूरज मल जी के पिता राजा श्री बदन सिंह जी ने ही उनका पालन पोषण किया। महाराजा श्री सूरजमल जी को ही भरतपुर रियासत की नींव रखने का श्रेय जाता है। जो आज राजस्थान के भरतपुर शहर के नाम से जाना जाता है। साल 1733 में भरतपुर रियासत की स्थापना की थी।
महाराजा श्री सूरजमल जी ने जिन्होंने विदेशी लुटेरे, अत्याचारी, आक्रांता, हरामी मुगलों के सामने कभी घुटने नहीं टेके थे और पानीपत के युद्ध के बाद मराठों को शरण दी थी?
भरतपुर के संस्थापक महाराजा सूरज मल जी जाट
वैसे तो धोरों और शूरवीरों की धरती राजस्थान के वीर योद्धाओं की गाथा का गुणगान समूचे विश्व में होता है। शूरवीर राजपूती योद्धाओं के शौर्य के कारण राजस्थान को पहले राजपुताना कहा जाता था। इस राजपुताने में एकमात्र जाट महाराजा थे महाराजा श्री सूरजमल जी । वे भरतपुर के संस्थापक थे। 13 फरवरी 1707 को जन्में महाराजा श्रीसूरजमल जी राजा श्री बदनसिंह जी के पुत्र थे। महाराजा श्री सूरजमल जी को कुशल प्रशासक, दूरदर्शी और कूटनीति का धनी माना जाता है। उन्होंने सन् 1733 में भरतपुर रियासत की स्थापना की थी।
महाराजा श्री सूरज मल जी जाट .अपने दोनों हाथों में तलवार लेकर करते थे युद्ध
महाराजा श्री सूरजमल जी जाट अपने दोनों हाथों में तलवार लेकर युद्ध किया करते थे। इसका भी एक खास किस्सा है कि राजा श्री सूरजमल जी जाट का जयपुर रियासत के महाराजा श्री जयसिंह जी के अच्छा रिश्ता था। महाराजा श्री जयसिंह जी की मृत्यु के बाद उनके दोनों बेटों श्री ईश्वरी सिंह जी और श्री माधोसिंह जी में रियासत के वारिश बनने को लेकर झगड़ा शुरु हो गया। महाराजा श्री सूरजमल जी बड़े पुत्र श्री ईश्वरी सिंह जी को रियासत का अगला वारिस बनाना चाहते थे, जबकि उदयपुर रियासत के महाराणा श्री जगतसिंह जी छोटे पुत्र श्री माधोसिंह जी को राजा बनाने के पक्ष में थे। इस मतभेद की स्थिति में गद्दी को लेकर लड़ाई शुरु हो गई। मार्च 1747 में हुए संघर्ष में श्री ईश्वरी सिंह जी की जीत हुई। लड़ाई यहां पूरी तरह से खत्म नहीं हुई । श्री माधोसिंह जी मराठों, राठोड़ों और उदयपुर के सिसोदिया राजाओं के साथ मिलकर वापस रणभूमि में आ गये । ऐसे माहौल में महाराजा श्री सूरजमल जी ने अपने 10,000 सैनिकों को लेकर रणभूमि में श्री ईश्वरी सिंह जी का साथ देने पहुंच गए थे। इस युद्ध में श्री ईश्वरी सिंह जी को विजय प्राप्त हुई और उन्हें जयपुर का
राजपाट और गददी मिल गयी । इसके बाद महाराजा श्री सूरजमल जी का डंका पूरे भारत देश में बजने लगा।
लौहागढ़़ किले को आज तक कोई नहीं भेद पाया
राजस्थान के भरतपुर में स्थित लौहागढ़ किले को देश का एकमात्र अजेय दुर्ग कहा जाता है। इस किले को आज तक कोई भेद नहीं पाया। अंग्रेजों ने इस किले पर 13 बार अपनी तोपों से भंयकर आक्रमण किया लेकिन वे कभी भी सफल नहीं हो पाए। किले का निर्माण महाराजा श्री सूरजमल ने ही कराया था। बताया जाता है कि कुमावत शिल्पकारों ने इस किले को बनाने में एक विशेष युक्ति का उपयोग किया गया था, जिससे तोप के गोलों का भी इस पर कोई असर नहीं पड़ता।
पानीपत की लड़ाई में मराठों की मदद की
महाराजा श्री सूरजमल जी ने पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों के आधे से ज्यादा सैनिक मारे जाने के बाद उनकी काफी मदद की। युद्ध हारने के बाद मराठों के पास ना तो पूरा राशन था और ना ही उन्हें इलाके के बारे में कोई ज्यादा जानकारी थी। महाराजा श्री सूरजमल जी ने पानीपत के युद्ध से पहले श्री सदाशिव भाऊ जी को सलाह दी थी कि अब्दाली की सेना पर अभी आक्रमण करना ठीक नहीं है। क्योंकि उस दौरान सर्दियां थी। महाराजा श्री सूरजमल जी ने सलाह दी थी कि अफगान सैनिक सर्दी आसानी से सह लेंगे लेकिन गर्मी नहीं सह सकते, ऐसे में गर्मी में हमला करना ठीक होगा।
मराठा शासक इस युद्ध में कई हजार स्त्रियों और बच्चों को साथ लेकर चले थे। महाराजा श्री सूरजमल जी ने सलाह दी कि स्त्रियों और बच्चों को साथ लेकर मत घूमों, इससे ध्यान युद्ध से बंटेगा। इसके अलावा महाराजा श्री सूरजमल जी ने मराठाओं को कई सलाह दी लेकिन वे नहीं माने। जब पानीपत के तीसरे युद्ध में उनकी हार हुई तो महाराजा श्री सूरजमल जी ने 30-40 हजार सैनिकों को भरतपुर में शरण दी। उस समय वे भूखे-प्यासे थे। भयंकर सर्दी के कारण उनकी हालत खराब थी। महाराजा और महारानी किशोरी जी ने जनता से अपील कर अनाज इकठ्ठा किया और उस समय लगभग इसका खर्च 20 लाख रुपए आया था। उन्होंने कई माह तक मराठाओं को शरण दी। जाते हुए हर व्यक्ति को एक रुपया, एक सेर अनाज और कुछ कपड़े दिए गए, जिससे उन्हें परेशानी ना हो।
सन् 1753 तक महाराजा श्री सूरजमल जी ने दिल्ली और फिरोजशाह कोटला तक अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ा लिया था। इस बात से नाराज होकर दिल्ली के नवाब गाजाउद्दीन ने महाराजा श्री सूरजमल जी के खिलाफ मराठा सरदारों को भड़का दिया। मराठों ने भरतपुर पर चढ़ाई कर दी। कई माह तक उन्होंने कुम्हेर किले को घेरे रखा। वे भरतपुर पर कब्जा तो नहीं कर पाए, बल्कि मराठा सरदार मल्हारराव के बेटे खांडेराव होल्कर की मृत्यु हो गई। कुछ समय बाद उन्हें महाराजा श्री सूरजमल से सन्धि करनी पड़ी।
भरतपुर रियासत का विस्तार
भरतपुर के संस्थापक महाराजा श्री सूरजमल जी ने भरतपुर रियासत का धौलपुर, आगरा, मैनपुरी, अलीगढ़, हाथरस, इटावा, मेरठ, रोहतक, मेवात, रेवाड़ी, गुडग़ांव और मथुरा तक कर दिया था। 25 दिसम्बर 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हिंडन नदी के तट पर हुए युद्ध में महाराजा श्री सूरजमल जी वीरगति को प्राप्त हो गए।
भरतपुर और आसपास के क्षेत्र के लोगों का कहना है कि हमारे इतिहास को गौरवमयी बनाने का श्रेय महाराजा श्री सूरजमल जी जैसे वीर योद्धाओं को जाता है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए थे।
महाराजा श्री सूरजमल जी जाट (13 फ़रवरी 1707 - 25 दिसम्बर 1763), जिन्हें केवल सूरजमल के नाम से भी जाना जाता है ,वे वर्तमान राजस्थान राज्य के भरतपुर राज्य के एक जाट शासक थे । वह अपने सैन्य कौशल और प्रशासनिक कौशल के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने उस क्षेत्र में एक समृद्ध राज्य की स्थापना की जो अब राजस्थान , उत्तर प्रदेश और हरियाणा के कुछ हिस्सों को शामिल करता है । उन्हें आमतौर पर जाटों का प्लेटो या जाट अफलातून के रूप में जाना जाता है। उनके अधीन, जाट शासन ने वर्तमान आगरा , अलवर , अलीगढ़ , भरतपुर , धौलपुर , इटावा , हाथरस , मैनपुरी , मेरठ , गाजियाबाद , मथुरा और रोहतक , सोनीपत , झज्जर , नूंह , पलवल , फरीदाबाद , कासगंज , मैनपुरी , फिरोजाबाद , बुलंदशहर जिलों को कवर किया।
एक समकालीन इतिहासकार ने उन्हें " सिनसिनवार जाट जनजाति का प्लेटो " और एक आधुनिक लेखक ने उनकी "राजनीतिक दूरदर्शिता, स्थिर बुद्धि और स्पष्ट दृष्टि" के कारण "जाट यूलिसिस " के रूप में वर्णित किया था। महाराजा श्री सूरजमल जी के नेतृत्व में लोगों ने आगरा में विदेशी,लुटेरी और विधर्मी मुगल सेना पर कब्ज़ा कर लिया था । उनके किलों में तैनात सैनिकों के अलावा, उनके पास 75,000 से अधिक पैदल सैनिकों और 38,000 से अधिक घुड़सवारों की एक सेना थी।
लोहागढ़ किला राजस्थान के भरतपुर शहर में स्थित प्रसिद्ध किलों में से एक है जिसे महाराजा सूरजमल ने १७३२ में एक कृत्रिम द्वीप पर बनवाया था और इसे पूरा होने में आठ साल लगे थे। वह अपने राज्य में ऐसे अन्य किलों और महलों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं। इस तरह के अभेद्य किले को बनाने के लिए बड़ी संख्या में जनशक्ति और महत्वपूर्ण मात्रा में धन की आवश्यकता थी, जैसा कि किले का नाम ही कहता है - "लोहागढ़", जिसका अर्थ है, लोहे का किला (लोहा का मतलब लोहा और गढ़ का मतलब किला है)। लोहागढ़ किला सबसे मजबूत किलों में से एक माना जाता है क्योंकि लॉर्ड लेक के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना भरतपुर की घेराबंदी के दौरान कई हमलों के बावजूद इसे कब्जा नहीं कर सकी थी । लॉर्ड लेक ने १८०५ में छह सप्ताह तक किले की घेराबंदी की लेकिन इतने हमलों के बावजूद वह इसे हड़प नहीं सके। बाद में दिसंबर 1825 और जनवरी 1826 के बीच, लॉर्ड कॉम्बरमेयर के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने शुरू में राज्य की राजधानी को घेर लिया, जब तक कि 18 जनवरी 1826 को इसके किले पर हमला नहीं किया गया और उस पर कब्ज़ा नहीं कर लिया गया। इस घेराबंदी के बाद, भरतपुर ब्रिटिश राज के नियंत्रण में रियासत बन गया।
डीग पैलेस भारत के राजस्थान राज्य के डीग जिले के भरतपुर शहर से 32 किमी दूर डीग में स्थित एक महल है । इसे महाराजा सूरजमल ने 1730 में भरतपुर राज्य के शासकों के लिए एक शानदार ग्रीष्मकालीन रिसॉर्ट के रूप में बनवाया था ।
शेष भाग -2 में
प्रस्तुति -निर्माता निर्देशक- चिरँजी कुमावत,8619666046
Email chiranjikumawat54@gmail. com
खम्मा घणी सा
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