महान और जांबाज वीर योद्धा झुंझार श्री डूंगर सिंह जी भाटी

 

कहानी महान वीर योद्धा श्री डूंगर सिंह जी भाटी की: 👉
राजपुताना राजस्थान महान और देशभक्त जांबाज वीरों की भूमि रही है। राजस्थान में यहाँ ऐसा कोई गांव नहीं जिस पर राजपूती खून न बहा हो, जहाँ किसी जुंझार का देवालय न हो, जहाँ कोई युद्ध न हुआ हो। भारत में क्रूर, अत्याचारी, अय्याश,आक्रांता, विदेशी लुटेरे, तुर्क और मुस्लिम आक्रमणकारियों कोे रोकने और उनसे लोहा लेने के लिए लाखों लाख जांबाज और देशभक्त राजपूत योद्धाओं ने  पानी की तरह अपना खून बहाया है ।  राजपूतों की देशभक्ति और बहादुरी की ऐसी बहुत सी वीर गाथायें मरू भूमि के जर्रे जर्रे में समायी और इतिहास के सुनहरे पन्नों में दबी पडी है ।। 
इसी सन्दर्भ में एक सच्ची घटना इस प्रकार है ।-
उस वक्त जैसलमेर और बहावलपुर(वर्तमान पाकिस्तान में) दो पड़ोसी राज्य थे। बहावलपुर के नवाब की सेना आये दिन जैसलमेर राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों में डकैती, लूटपाट, अय्याशी और मारकाट करती रहती थी परन्तु कभी भी वह जैसलमेर के भाटी वंश के शासकों से सीधे टकराने की हिम्मत नहीं कर पाती थी।
उन्हीं दिनों एक बार जेठ की कलकती भरी दोपहरी में दो जांबाज राजपूत वीर श्री डूंगर सिंह जी उर्फ़ पन्न राज जी, जो की जैसलमेर महारावल के छोटे भाई के पुत्र थे और उनके भतीजे श्री चाहड़ सिंह जी जिसकी शादी कुछ दिन पूर्व ही हुयी थी, दोनों युवा और जांबाज वीर जैसलमेर बहावलपुर की सीमा से कुछ दुरी पर एक तालाब में स्नान कर रहे थे। तभी अचानक उन्हें बहुत जोर से शोर सुनाई दिया और कुछ कन्याओं के चिल्लाने की आवाजें आई। उन्होंने देखा की कुछ ही दूरी पर बहावलपुर के नवाब की सेना की एक टुकड़ी जैसलमेर रियासत के ही ब्राह्मणों के गाँव “काठाडी” से लूटपाट और मारकाट कर अपने ऊँटों पर लूटा हुआ सामान और साथ में गायें और, ब्राह्मणों की कई सुन्दर कन्याओं और औरतों को अपहरण कर जबरदस्ती ले जा रही है। कन्यायें और औरतें  अपने आपको बचाने की मिन्नतें और गुहार लगा रही थी ।
पर इन हरामी मुगलों की मुस्लिम सेना के मुल्लों पर उन कन्याओं की चीख पुकार का कोई असर नहीं पड़
 रहा था ।
तभी श्री डूंगर सिंह जी उर्फ़ पनराजजी ने अपने भतीजे श्री चाहड़ सिंह जी को कहा की तुम जैसलमेर जाओ और वहाँ महारावल जी से सेना लेकर तुरंत आओ तब तक मैं इन हरामी मुस्लिम लुटेरी सेना को यहाँ युद्ध करके रोकता हूँ। लेकिन श्री चाहड़ सिंह जी समझ गए थे की काका श्री डूंगर सिंह जी,कुछ दिन पूर्व विवाह होने के कारण ही उन्हें सेना लेकर आने के बहाने भेज रहे हैँ।  श्री डूंगर सिंह जी द्वारा काफी समझाने पर भी श्री चाहड़ सिंह जी नहीं माने ।
 और अंत में राजपूताना के दोनों जांबाज वीर अपने क्षत्रिय धर्म के अनुरूप सनातन  धर्म निभाने, गौ, ब्राह्मण और औरतों की अस्मिता को बचाने के लिए  अपने घोडों पर बैठकर, लगाम खिंचते हुए,  लुटेरी और हरामी मुस्लिम सेना पर, तलवार लिए बिजली  की रफ्तार से काल बनकर बनकर टूट पड़े।
 श्री डूंगर सिंह जी को एक बड़े सिद्ध पुरुष ने सुरक्षित रेगिस्तान पार कराने और अच्छे सत्कार के बदले में एक चमत्कारिक हार दिया था जिसे वो हर समय अपने गले में पहनते थे।
राजपूताना के दोनों जांबाज वीर, विदेशी लुटेरी, अत्याचारी, हरामी और अय्याश मुस्लिम सेना की टुकडी पर टूट पड़े और देखते ही देखते बहावलपुर के मुस्लिम नवाब की सेना की टुकड़ी के लाशों के ढेर पर ढेर गिरने लगे। लुटेरी और अय्याश मुस्लिम नवाब की सेना से बहादुरी से लड़ते लड़ते कुछ समय बाद वीर श्री चाहड़ सिंह (भतीजे) वीर गति को प्राप्त हो गए ।
 
अपने भतीज श्री चाहड़ सिंह जी को वीर गति को प्राप्त हुआ देखकर । श्री डूंगर सिंह जी  और भी अधिक क्रोधित और आग बबूला हो उठे । उन्होंने लुटेरी हरामी और अय्याश मुस्लिम सेना से दुगुने जोश में युद्ध लड़ना शुरू कर दिया। लाशों के ढेर से धरती पटने लगी । तभी अचानक एक मुस्लिम सैनिक ने धोखे से पीछे से वार कर दिया और इसी धोखे और पीठ पीछे के वार से  उनका शीश उनके धड़ से अलग हो गया। 
एक किवदंती के अनुसार,  कहा जाता है कि श्री डूंगर सिंह जी का शीश घड़ से कटकर  गिरते वक़्त अपने वफादार घोड़े से बोला था कि - 
“ अब बाजू मेरा और आँखें तेरी” । जय भवानी ॥
 श्री डूंगर सिंह जी भाटी ने युद्ध में  अपना झुंझार रूप दर्शाया ,
 श्री डूंगर सिंह जी भाटी के घोड़े ने अपनी गजब की स्वामी भक्ति दिखाई और उनका धड़, शीश कटने के बाद भी बडी जांबाजी से तलवार चलाता रहा और लुटेरी मुस्लिम सेना से  लड़ता रहा ।
श्री डूंगर सिंह जी को झुंझार के रूप लड़ते हुए देखकर लुटेरे मुस्लिम सैनिक भयभीत होकर भाग खड़े हुए और  श्री डूंगर सिंह जी का धड़ घोड़े पर बैठे लड़ते लड़ते  पाकिस्तान के बहावलपुर के पास पहुंच गया। 
श्री डूंगर सिंह जी का बिना शीश के लड़ता हुआ घड का झुंझार स्वरूप का यह अद्भत दृश्य देखकर वहाँ के लोग अचम्भित रह गये । क्योंकि उन्होंने ऐसा झुंझार का अद्भूत
दृश्य पहले कभी नहीं देखा था ।

  कुछ लोग  दौडकर बहावलपुर नवाब के पास पहुंचे और कहा की एक बिना मुंड के आदमी लड़ता हुआ बहावलपुर की तरफ उनकी  सैनिक टुकडी को खत्म कर गांव के गांव तबाह कर जैसलमेर से चला आ रहा है।
वो सिद्ध पुरुष भी उस वक़्त  वहीं थे जिन्होंने श्री .डूंगर सिंह जी को वो हार दिया था। वे सिद्धपुरुष समझ गए थे कि वह कोई और नहीं  श्री डूंगर सिंह जी ही हैं। उन्होंने सात 7 कन्या नील ले कर पोल(दरवाजे के ऊपर) पर खडी कर दी और जैसे ही श्री डूंगर सिंह जी का  घड घोड़े पर बैठे हुए पोल के नीचे से निकला उन कन्याओं के नील डाल दिया । नील डालते ही श्री डूंगर सिंह जी धड़ शांत हो गया।
"ना मृत्यु का भय वीरों, ना ही जीवन से प्रीत ।
शिश कटे पर धड़ लडे, यही राजपूती री रीत ॥

बहावलपुर, जो की पाकिस्तान में है जहाँ  श्री डूंगर सिंह जी भाटी  का धड़ गिरा, वहाँ इस महान और जांबाज वीर योद्धा को मुण्डापीर कहा जाता है। इस राजपूत वीर की समाधी/मजार पर उनकी याद में हर साल मेला लगता है और मुसलमानों द्वारा चादर चढ़ाई जाती है।
वहीँ दूसरी ओर भारत के जैसलमेर का मोकला गाँव है, जहाँ श्री डूंगर सिंह जी उनका सिर कट कर गिरा था उसे डूंगरपीर कहा जाता है। वहाँ एक मंदिर बनाया हुआ है और हर रोज पूजा अर्चना की जाती है। श्री डूंगर पीर की मान्यता दूर दूर तक है और दूर दराज से लोग मन्नत मांगने आते हैँ।  

“दो दो मेला नित भरै, पूजे दो दो ठौड़।  
सर कटियो जिण ठौड़ पर, धड जुझ्यो जिण ठौड़॥ ”

मतलब :- एक जांबाज वीर झुंझार राजपूत की समाधी पे दो दो जगह मेले लगते है, पहला जहाँ उसका सर कटा था और दूसरा जहाँ उसका धड लड़ते हुए गिरा था….


जय हिन्द ।
जय भारत ॥
वन्दे मातरम् ॥
प्रस्तुति - निर्माता निर्देशक चिरँजी कुमावत, 8619666046
Email- chiranjikumawat54@gmail.com

जय राजपुताना 💪🚩

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